मुख्यमंत्री हमीरपुर जिले से ताल्लुक रखते हैं। समस्त ढांचे में क्या बुनियादी सुधार हो पाएगा, यही यक्ष प्रश्न है।

लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों के बीच ढांचे की मुकम्मल तौर पर जो पोल खुली है, उसी की वजह से अब अग्रिम पंक्ति में बैठने वाले नेताओं की ‘बेचैनी’ भी बढ़ गई है। कारण साफ है,  की बदलाव की दशा और दिशा दोनों ही ‘राजनीति की दुकान’ कहीं सिमट न जाए ? बस इसी बात की आशंका नेताओं को ‘कचोट’ रही है, क्योंकि इन चुनावों में इतना तो तय हो गया है कि मौजूदा व्यवस्था में न ही तो भाजपा की दशा दिशा सुधारने वाली है और न ही कांग्रेस के हालात सत्ता के बावजूद भी असरदार साबित होने वाले। इसीलिए संगठनात्मक ढांचे में बदलाव को लेकर किस स्तर पर काम शुरू होगा ? इसकी इंतजार शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री यह गृह जिला भी माना जा रहा है 

कांग्रेस में जिला स्तर पर हो या फिर ब्लॉक लेबल का मसला। हालात यहां भी मुख्यमंत्री के इस गृह जिला में ‘गुदगुदाने’ वाले नहीं हैं। इन चुनावों में बड़े नेताओं ने इसकी जो झलक देखी है, उसी की वजह से तो पार्टी प्रत्याशियों को समस्या झेलनी पड़ी है। मसला चाहे ब्लॉक स्तर का हो या फिर जिला स्तर का। केवल स्टॉप गैप अरेंजमेंट से काम चलने वाला नहीं है। यहां निश्चित रूप में उन लोगों को आगे लाने की जरूरत है, जो संगठन में केवल दुकानदारी

लाने के लिए न आए, क्योंकि चुनावों में प्रत्याशियों ने भी इस ढांचे का सब कुछ बेनकाब कर दिया है। अब स्टेज पर पहली पंक्ति में बैठने वाले इन नेताओं का बनेगा क्या, इसी की चर्चा हो रही है क्योंकि प्रत्याशियों ने सूचियां बना रखी है, तो कइयों की बन रही हैं। काग्रेस में राजेंद्र जार के जिला अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद कुलदीप पठानिया को कमान सौंपी गई; के बाद सुमन भारती जिला अध्यक्ष बने, लेकिन विडंबना यह रही कि जिला कार्यकारिणी के ढांचे की है कि मुख्यमंत्री हमीरपुर जिले से ताल्लुक रखते हैं। समस्त ढांचे में क्या बुनियादी सुधार हो पाएगा, यही यक्ष प्रश्न है। I

बड़सर में अध्यक्ष बदले गए, क्योंकि वहां उलटफेर बहुत हो गया था और परिस्थितियों काग्रेस के अनुकूल ज्यादा नहीं थीं। सुजानपुर में भी बड़सर जैसी ही स्थिति थी। वहां भी अफरा- तफरी में नए अध्यक्ष बनाए गए। इसके बाद हमीरपुर में उपचुनाव की बेला पर अध्यक्ष बदले गए, लेकिन कार्यकारिणी लंबे समय से कैसी है, कौन लोग हैं, किसी को कोई पता ही नहीं है। बावजूद इसके चुनाव यहां पर लड़ा गया। काग्रेस की हार हुई, तालमेल कितना था? इसकी पोल भी खूब खुली। खैर, इसकी चर्चा करने से कोई फायदा नहीं है, लेकिन जब संगठनात्मक ढांचा ही तैयार नहीं होगा, तो फिर चुनावी नैया पार कैसे होगी? कांग्रेस इस समय प्रदेश में सत्ता में है। मुख्यमंत्री हमीरपुर जिले से ताल्लुक रखते हैं। समस्त ढांचे में क्या बुनियादी सुधार हो पाएगा, यही यक्ष प्रश्न है। जिस पर पुराने और नए जुड़े वर्कर्स की नजरें अब खास अंदाज में कुछ मांग रही है।

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